आत्म-साक्षात्कार

आत्म-साक्षात्कार पाना अति आवश्यक है

हमारा जीवन आत्म-साक्षात्कार के बाद एक दिव्य, एक भव्य, एक पवित्र जीवन बन जाता है इसीलिए मनुष्य के लिए आत्म-साक्षात्कार पाना अति आवश्यक है। उसके बगेर उसमे संतुलन नही आ सकता। उसमें सच्ची सामूहिकता नहीं आ सकती। उसमें सच्चा प्रेम नहीं आ सकता। और सबसे अधिक उसमें सत्य जाना नहीं जा सकता। तो सारा ज्ञान, उसकी शुद्ध ज्ञानता आ जाती है। जिसे कि विद्या कहा जाता है, तो उसका देखना भी निरंजन हो जाता है। वो देखना मात्र होता है। कोई बीज को देखते वक्त उसमें कोई उसकी प्रतिक्रिया नही होती है। देखता है और देखने से ही पूरा ज्ञान हो जाता है उस चीज़ का। तो मनुष्य हमेशा जब आत्म-साक्षात्कार से प्लावित नही होता तो वो एक तरह से अपने ही बारे में सोचता है।

 

 

आत्मा

सहज योग में जब आप आत्मा बन जाते हैं तब सभी कुछ बदल जाता हैं। आप एक ऐसे मनुष्य बन जाते हैं जो जानता हैं की प्रसन्नता क्या होती है, प्रसन्नता का आनंद कैसे लिया जा सकता है,जीवन का आनंद कैसे लिया जाए -और जो दूसरों को खुशी देता है-सदैव यह सोचता रहता है कि दूसरों को कैसे आनंदित किया जाए । आप एक बुद्धिमान, सुंदर और आनंदमयी व्यक्ति बन जाते हैं। आप एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जिसके विषय में आपको पता नहीं होता। आप स्वयं को परख लीजिए कि जो में कह रही हूँ वह सही है या  नहीं है।

एक सहज योगी कहीं भी रह सकता है, कहीं भी सो सकता है।उसकी आत्मा उसे प्रसन्नता प्रदान करती है। सारे विचार जो मनुष्यों में हैं उन्हें समस्याओं में फंसाते जाते हैं कि आप किसी दूसरे धर्म के अनुयायी हैं तो आप 'खराब' हैं। अगर आपको ईसाईयों के विषय में पूछना है तो जीवों से पूछ लीजिए। जीव के विषय में आपको मुसलमान बतायेंगे और मुसलमानों के विषय में आपको हिन्दू। आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि वो कैसे लोगों के विषय में बोलते हैं। जैसे अन्य सारे 'ख़राब' हैं और वो ही सबसे अच्छे हैं।

अतः यह विचार पूर्ण रूप से बदल जाते हैं। सहज में आप भूल जाते हैं कि कौन क्या हैं, किसका धर्म क्या है, कौन किस परिवार से आया है। सारे एक हो जाते हैं। वे सारे सहजयोगियों कि सामूहिकता का आनंद उठाते हैं- यहीं मक्का है, यहीं कुम्भ मेला है। यह सामूहिक आनंद आपको इसलिए मिलता है कि आप उन सभी बन्धनों को काट जाते हैं जो सत्य को देखने से आपको रोकता है। सत्य यह है कि आप आत्मा बन गए हैं, और जब आप आत्मा बन जाते हैं तब आप गुणातीत , कालातीत और धर्मातीत भी बन जाते हैं। 

आप सागर की एक बूंद बन जाते हैं। अगर यह बूंद सागर के बाहर रहती है तब यह सदैव सूर्य से डरी रहती है क्योंकि वह इसे सुखा देगा। परन्तु जब वह सागर के साथ होती है तब वह आनंदित होती है क्योंकि वह अकेली नहीं है -बल्कि आनंद के सागर की लहरों के साथ हिलोरें ले रही होती है।

 

तनाव क्यूँ आता हैं?

आधुनिक पूर्व में एक ऐसे चीज़ है जो तनाव कहलाती है| इस से पूर्व कभी इसका अस्तित्त्व न था| लोग कभी तनाव की बात नही कीया करते थे, आज हर आदमी कहता है मैं तनाव मैं हु| आप मुझे तनाव दे रहे है|"

तनाव क्या है? ये मेरे अवतरण के कारण है| तालू क्षेत्र मेरे बारे मैं जानना चाहता है| ज्यो - जयो सहजयोग फ़ैल रहा है कुंडलिनी अन्य लोगो मैं उठने का प्रयत्न कर रही है क्यूँकी लोग यंत्र बन गए है| जहा भी आप जाते है चैतन्य -लहरियों का संचार करते है और ये चैतन्य लहरिया कुण्डलिनी को चुनोती देती है या संदेश देती है और कुण्डलिनी बहुत से लोगो में उठती है| पहचान के कमी के कारण हो सकता है के कुण्डलिनी सहस्त्रार तक न उठे या उठकर फीर नीचे आ जाए| तो जीतनी बार वे कुछ करते है कुण्डलिनी ऊपर आती है और उन्हें तनाव देती है क्योंकी उनके सहस्त्रार बंद है, ये एक बंद दरवाजा है| दरवाजा बंद होने के कारण यह उनके सर मैं एक प्रकार का खिचाव देती है जिसकी समझ उन्हें नही है| वे इसे तनाव कहते है| वास्तव में कुण्डलिनी अपने आप को बहार खीचने का प्रत्यन करती है परंतु वेह ऐसा नही कर पाती| जीन लोगो को आत्म-साक्षात्कार मील जाता है और वे अपने सहस्त्रार के खुला (ठीक) नही रखते उन्हें भी इसी प्रकार के तनाव का सामना करना पड़ता है|

 

आत्मा असीम है जब की मस्तिष्क सिमित है

आत्मा समुद्र की भांति है जिसके अन्दर रोशनी भरी पड़ी है। और जब इस समुद्र (रुपी आत्मा) को आप के मस्तिष्क के छोटे प्याले में उडेल दिया जाता है तब प्याला अपना अस्तित्व खो देता है और सब कुछ अध्यात्मिक हो जाता है। सभी कुछ। आप सब कुछ अध्यात्मिक बना सकते हैं। हरेक चीज़। आप जिस चीज़ को भी स्पर्श करे वह अध्यात्मिक हो जाती है। रेत अध्यात्मिक हो जाती है, जमीन अध्यात्मिक हो जाती है, वातावरण अध्यात्मिक बन जाता है, ग्रह - नक्षत्र इत्यादी भी अध्यात्मिक बन जाते है। सब कुछ अध्यात्मिक हो जाते हैं।

यह आत्मा समुद्र (की भांति असीम) है। जब कि आपका मस्तिष्क सिमित है।

आपके सिमित मस्तिष्क में निर्लिप्तता (detachment) लानी होगी। मस्तिष्क की सभी सीमाओं को तोड़ना होगा। ताकि जब यह समुद्र इस मस्तिष्क को प्लावित कर देता है तब यह उस छोटे प्याले का कण - कण रंग में रंगा जाए। सम्पूर्ण वातावरण, प्रत्येक वास्तु, जिस पर भी आप की दृष्टी जाए, रंग जानी चाहिए। आत्मा का रंग, आत्मा का प्रकाश है और ये आत्मा का प्रकाश कार्यान्वित होता है। कार्य करता है, सोचता है, सहयोग प्रदान करता है, सब कुछ करता है।

 

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